Saturday, 6 April 2019

हस्त रेखा विज्ञानं का इतिहास और महत्त्व

दोस्तों नमस्कार जय गुरु देव ! दोस्तों आज हम बात करेंगे हस्त रेखा विज्ञानं के इतिहास और हस्त रेखा विज्ञानं के महत्व  की !हस्त रेखा विज्ञानं मूल रूप से समुद्र ऋषि लिखित समुद्र शास्त्र का अभिन्न अंग है ! हस्त रेखा विज्ञानं के बारे में कहा  गया है ,ये वो जन्म कुंडली है जो स्वय ब्रह्मा जी द्वारा लिखित है ,जिसको कोई नहीं बदल सकता इस जन्म कुंडली का अगर आपको सच में अध्यन करना आता है तो आप किसी का भी भूत भविष्य और वर्तमान जान सकते है !ये सच है हस्त रेखा विज्ञानं अति प्राचीन अगर हिन्दू महाग्रंथों की बात की जाये तो हस्त रेखा विज्ञानं का बहुत अच्छे उदहारण मिलते है !जैसे रामचरित्र मानष के बालकाण्ड में एक दोहा है , जब  हिमालय राजा पर्वतराज हिमालय की पुत्री गिरिजा जब विवाह योग्य हो जाती है तो उनको उसके विवाह की चिंता होती है ,तब वो देव मुनि नारद जी को बुलाते है और वो कन्या का हाथ देख कर एक दोहा बोलते है ;-
                                     जोगी जटिल ,अकाम मन नग्न अमंगल भेष !
                                    अस स्वामी एही कहि ,मिलहि परी हस्त रेख !!
हे पर्वत राज इस कन्या के हाथ में ऐसी रेखा पड़ी है जिसके अनुसार इसका पति तीनो लोको का स्वामी होते हुए भी बरागी होगा !सब को मंगल देने वाला होने के बावजूद स्वयं अमंगलकारी भेष भूसा धारण ,जटाजूट रखने वाला कामदेव को दग्ध करने वाले देवो के देव महादेव होंगे !
इस लिए हम कह सकते है हस्त रेखा विज्ञानं अति प्रचीन है !
हस्त रेखा विज्ञानं और ज्योतिष में एक बहुत बड़ा फरक है दो जुडवा बच्चों का भविष्य एक जैसा नहीं हो सकता ,जबकि कुंडली दोनो की एक जैसी ही होगी !लेकिन दो इंसानो की हस्त रेखा कभी एक जैसी नहीं हो सकती !
मेरा मानना है तीनो लोको में हस्त रेखा विज्ञानं से भड़ कर कोई ज्ञान नहीं हो सकता !
अगर बात करे हस्त रेखा विज्ञानं के इतिहास की अगर बात की जाये तो कस्यप ऋषि का एक श्लोक अध्यन आवश्यक है ! जिसमे कहा गया है आर्यवर्त में ज्योतिष के १८ आचार्य का योगदान कभी भोला नहीं जा सकता जो की निम्न कर्मानुसार है !
१ सूर्य २ पितामह ३ व्यास ४ वसिष्ठ ५ अत्रि ६ परासर ७ कस्यप ८ नारद ९ गर्ग १० मरीचि ११ मनु १२ अंगिरा १३ लोमेश १४ पोइलिश ,१५ च्यवन १६ पवन १७ भृंगु १८ शोनक !
ये १८ ज्योतिष के पर्वतक दुरन्धर आचार्य हुए है !इतिहास कारो के अनुसार हस्त रेखा विज्ञानं में विदेशी विद्वानों का संबंध दो से तीन हजार साल पुराना है !जबकि भारत में ये लाखो साल से है ! क्यूंकि वेदो को हमने लाखो साल पुराना माना है और वेदो में भी हस्त रेखा विज्ञानं का उल्लेख है !अथर्व वेद के ७.५२.८ में एक श्लोक है जिसमे कहा गया है :-
कृतं दक्षिणे हस्त ,जयो में स्वय आहितः !
अर्थात  मेरे दाये हाथ में वर्तमान है तो बाए हाथ में भूतकाल ! क्यूंकि हम सब जानते है दाये हाथ से वर्तमान देखा जाता है जबकि बाये हाथ से भूत काल या पूर्वजन्म को देखा जाता है !
तो इस बात में तो कोई सक नहीं है की हस्तरेखा विज्ञानं का उदय हिंदुस्तान से ही हुवा है और यही से विदेशो में गया है ! विदेशो में ये ईशा से करीब ४०० साल पहले चला गया था ,विदेशी विद्वानों की अगर बात की जाये तो सर्वपर्थम एरिस्टोटल का नाम आता है ये ग्रीक विद्वान् थे जिनका जन्म ईशा से ३८४ से ३२२ वर्ष पूर्व हुवा इन्होने जिस ग्रंथ की रचना की उसका नाम chyromantia aristotelis cum figuris  और de coeio et mundicausa है जिसका प्रकाशन पूर्ण रूप से १५३९ ईस्वी में लेटिन भासा में हुवा ! उनके बाद काफी विदेशी विद्वानों ने हस्त रेखा विज्ञानं के प्रचार प्रसार में सहयोग दिया जिसमे मुख्य रूप से हिप्पोक्रेट ,एनोग्रेश,अल्बर्ट मेगनेश ,हिस्पानसः,अग्रीपा कर्नेलेश ,जॉर्ज बिलियम बेनहम और प्रोफेसर केरो के नाम मुख्य रूप से लिया जा सकता है ! अगर बात की जाये भारतीय विद्वानों की तो वर्तमान काल में डॉ भोजराज दिवेदी जी और सतगुरु डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी का सहयोग बहुत बड़ा है ,इन्होने हस्त रेखा विज्ञानं का बारीकी से अध्यन करके समाज को नए फार्मूले प्रदान किये ! इस लिए दोस्तों हस्त रेखा विज्ञानं का विशेष महत्व है ,अगर आप इसका बारीकी से अध्यन करते हो तो आप किसी भी इंसान के जीवन का बारीकी से विश्लेषण कर पावोगे !
अगर आप हस्त रेखा विज्ञानं सिखने के इच्छुक है तो कॉल करे !
palmist  Rataan 9351497829 ,8107958677

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